वेनेजुएला के बाद अमेरिका ने अब इस देश पर की एयरस्ट्राइक, भारी तबाही से दहला इलाका

वेनेजुएला में सफल सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका ने अब सीरिया में बड़ा हवाई हमला किया है। पिछले महीने पाल्मायरा में इस्लामिक स्टेट (ISIS) के घातक हमले के जवाब में अमेरिका ने ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक शुरू किया। यह अभियान आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक सैन्य कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप के निर्देशों पर अंजाम दिया गया।

इस ऑपरेशन की पृष्ठभूमि में वह हमला है, जिसमें अमेरिका ने अपने दो सैनिक—सार्जेंट एडगर ब्रायन टोरेस-टोवर और सार्जेंट विलियम नथानिएल हॉवर्ड—को खो दिया था। उनके साथ एक अमेरिकी सिविलियन इंटरप्रेटर अयाद मंसूर सकत की भी जान गई थी। ये दोनों सैनिक आयोवा नेशनल गार्ड से जुड़े थे। इस घटना के बाद वॉशिंगटन ने कड़ी जवाबी रणनीति अपनाने का फैसला किया।

ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, शनिवार को किए गए हवाई हमले इसी व्यापक अभियान का हिस्सा थे। इस मिशन का लक्ष्य पूरे सीरिया में फैले ISIS नेटवर्क को कमजोर करना है। अमेरिकी वायुसेना ने साझेदार बलों के साथ मिलकर आतंकी संगठनों के लॉजिस्टिक्स ठिकानों, प्रशिक्षण शिविरों और हथियार भंडारों पर सटीक हमले किए।

इससे पहले 19 दिसंबर को मध्य सीरिया में भी बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई थी, जिसमें 70 से अधिक आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया गया था। सेंट्रल कमांड ने कड़ा संदेश देते हुए कहा कि यदि अमेरिकी सैनिकों को नुकसान पहुंचाया गया, तो दोषियों को दुनिया के किसी भी कोने में ढूंढकर खत्म किया जाएगा।

सीरिया का बदला राजनीतिक परिदृश्य
इस सैन्य अभियान की एक अहम कड़ी सीरिया में बदलता राजनीतिक माहौल है। लंबे समय तक कुर्द-नेतृत्व वाली सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज अमेरिका की प्रमुख साझेदार रही, लेकिन दिसंबर 2024 में बशर अल-असद की सत्ता से विदाई के बाद हालात बदले हैं। अब वॉशिंगटन सीरिया की नई अंतरिम सरकार के साथ समन्वय बढ़ा रहा है।

सीरिया ने आधिकारिक रूप से ISIS के खिलाफ वैश्विक गठबंधन में शामिल होकर सहयोग मजबूत किया है। यह तालमेल न सिर्फ आतंकवादी नेटवर्क को तोड़ने में मददगार माना जा रहा है, बल्कि मध्य पूर्व में स्थिरता की दिशा में भी एक अहम कदम है।

वैश्विक सुरक्षा पर असर
हाल के महीनों में ISIS ने फिर से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश की है। ऑपरेशन हॉकआई स्ट्राइक के जरिए अमेरिका यह स्पष्ट करना चाहता है कि आतंकवादी संगठनों को दोबारा उभरने का मौका नहीं दिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह आक्रामक रणनीति आतंकी ठिकानों को खत्म करने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है और अमेरिका अपने सैनिकों की कुर्बानी को व्यर्थ नहीं जाने देगा।

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