भारत और कनाडा के बीच हुआ नया यूरेनियम समझौता केवल एक ऊर्जा सौदा नहीं है, बल्कि वैश्विक भू राजनीति के शतरंज पर भारत की बढ़ती ताकत का बड़ा संकेत माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की बैठक के बाद सामने आया यह दस साल का यूरेनियम सप्लाई समझौता भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नई रफ्तार देगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले दशक में भारत की ऊर्जा खपत तेजी से बढ़ने वाली है, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड टेक्नोलॉजी और विशाल डेटा सेंटर नेटवर्क के कारण। दुनिया भर में डिजिटल अर्थव्यवस्था का केंद्र बनते भारत को स्थिर और विशाल ऊर्जा स्रोत चाहिए, और यही वजह है कि परमाणु ऊर्जा अब भारत की रणनीतिक प्राथमिकता बनती जा रही है। कनाडा की कंपनी Cameco के साथ हुआ यह करार 2027 से शुरू होगा और इसे भारत के उभरते टेक इकोसिस्टम और डेटा सेंटर क्रांति के लिए “एटॉमिक फ्यूल” माना जा रहा है।
इस सौदे ने क्षेत्रीय और वैश्विक हलकों में हलचल भी पैदा कर दी है। पाकिस्तान में इस बढ़ती परमाणु ऊर्जा साझेदारी को लेकर चिंता के स्वर सुनाई देने लगे हैं, क्योंकि इससे भारत की रणनीतिक क्षमता और ऊर्जा सुरक्षा दोनों मजबूत होंगी। वहीं कुछ विश्लेषक इसे अमेरिका की बैकडोर रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। कनाडा के जरिए भारत के साथ गहरे ऊर्जा और व्यापारिक संबंध बनाना, और अगले चार वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 70 अरब डॉलर तक ले जाने की योजना, वैश्विक शक्ति समीकरणों में एक नया संकेत दे रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या वॉशिंगटन एशिया में अपने सबसे मजबूत साझेदार को ऊर्जा और तकनीकी शक्ति से और सशक्त करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अगर ऐसा है, तो यह सौदा केवल व्यापार नहीं बल्कि उस भविष्य की झलक है जिसमें भारत ऊर्जा, तकनीक और भू राजनीति तीनों मोर्चों पर एक निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।


