कागजी शेर साबित हुआ इस्लामिक NATO? हूती से जंग में पिट रहे सऊदी को अब तक बचाने नहीं आया पाकिस्तान-तुर्की
लेखक: Administrator | 10 September 2026, 09:40 AM | 1 व्यूज़

पिछले करीब एक हफ्ते से सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। मंगलवार (8 सितंबर) को हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के चार शहरों को एक साथ निशाना बनाया। इस हमले में 73 लोग घायल हुए। इसके अलावा सऊदी के तेल कारोबार पर भी इसका असर पड़ा है। जिस जगह से रोजाना करीब 4 लाख बैरल तेल का निर्यात होता था, वहां काम पूरी तरह ठप होने की खबर है।
इन हमलों के बीच सबसे बड़ा सवाल पाकिस्तान और तुर्की को लेकर उठ रहा है। मक्का समझौते के तहत दोनों देशों से सऊदी की मदद की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन अब तक दोनों की ओर से सीधे सैन्य सहयोग सामने नहीं आया है।
हालांकि, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक बयान ने इस मामले को फिर चर्चा में ला दिया है। उनका कहना है कि अगर सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमले जारी रहते हैं, तो पाकिस्तान मध्य पूर्व की इस जंग में उतर सकता है।
ख्वाजा आसिफ ने कहा कि सऊदी पर लगातार हो रहे हमलों के बाद मक्का समझौता सक्रिय हो गया है। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अलर्ट पर है और समझौते के तहत सऊदी की मदद करना उसकी जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी साफ किया कि इस जिम्मेदारी को लेकर किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए।
आखिर क्या है मक्का समझौता?
मक्का समझौता सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुआ एक रक्षा समझौता है। इसके तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
समझौते में संयुक्त रक्षा अभ्यास और आपसी सुरक्षा सहयोग का भी प्रावधान है। इसके अलावा भविष्य में दूसरे देशों को भी इस व्यवस्था से जोड़ने की संभावना की बात कही गई है।
इसी वजह से इस समझौते की तुलना NATO से की जा रही है और इसे कई जगहों पर 'इस्लामिक NATO' भी कहा जा रहा है। समझौते के तहत सदस्य देशों के बीच रक्षा बजट और खुफिया जानकारी साझा करने जैसे मुद्दों पर भी सहयोग की बात है।
सऊदी में पाकिस्तान के हजारों जवान, फिर भी सीधे जंग से दूरी
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब में पाकिस्तान के करीब 8 हजार जवान पहले से तैनात हैं। इन जवानों की मौजूदगी के बावजूद पाकिस्तान ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई को लेकर अब तक कोई स्पष्ट फैसला नहीं किया है।
बताया जाता है कि पाकिस्तान ने इसी साल इन सैनिकों को सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए तैनात किया था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर मक्का समझौता वास्तव में सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की तरह काम करता है, तो सऊदी पर लगातार हो रहे हमलों के बावजूद पाकिस्तान अभी तक सीधे मैदान में क्यों नहीं उतरा?
इतना ही नहीं, समझौते और सुरक्षा सहयोग से जुड़े दावों के मुताबिक पाकिस्तान भविष्य में सऊदी अरब और तुर्की जैसे सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती कर सकता है। पाकिस्तान की ओर से परमाणु सुरक्षा को लेकर भी प्रतिबद्धता की बातें सामने आती रही हैं।
अब असली परीक्षा यही है कि मक्का समझौता सिर्फ कागजों और बयानों तक सीमित रहता है या सऊदी पर बढ़ते हमलों के बीच पाकिस्तान और तुर्की वास्तव में उसके साथ खड़े होते हैं।
