ब्रिक्स बैठक से पहले चर्चा में दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक गलियारा, भारत से होगी शुरुआत; रेल, समुद्र और सड़क मार्ग से जुड़ेंगे कई देश
लेखक: Administrator | 10 September 2026, 10:27 AM | 1 व्यूज़

क्या है इकोनॉमिक कॉरिडोर और भारत के लिए क्यों अहम है IMEC?
आपने अक्सर ‘इकोनॉमिक कॉरिडोर’ यानी आर्थिक गलियारे का नाम सुना होगा। लेकिन यह केवल कोई सड़क, रेलवे लाइन या समुद्री मार्ग नहीं होता। आर्थिक गलियारा किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में परिवहन, ऊर्जा और दूरसंचार सुविधाओं का ऐसा संयुक्त नेटवर्क होता है, जो प्रमुख व्यापारिक और औद्योगिक केंद्रों को आपस में जोड़ता है।
इसका उद्देश्य सामान और लोगों की आवाजाही आसान बनाने के साथ-साथ व्यापार, निवेश, रोजगार और क्षेत्रीय विकास को गति देना होता है।
सामान्य हाईवे से कितना अलग है आर्थिक गलियारा?
एक सामान्य हाईवे या रेलवे परियोजना आमतौर पर दो स्थानों को जोड़ती है। इसके विपरीत, आर्थिक गलियारा उत्पादन केंद्रों, मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स, बड़े शहरों, बंदरगाहों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों को एक नेटवर्क में जोड़ता है।
आर्थिक गलियारे की अवधारणा को 1990 के दशक के अंत में एशियाई विकास बैंक यानी ADB ने प्रमुखता दी थी। इसका लक्ष्य बुनियादी परिवहन सुविधाओं के विकास से आगे बढ़कर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय गरीबी कम करना था।
क्या है भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा?
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा यानी IMEC एक प्रस्तावित बहुराष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना है। इसका उद्देश्य भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच व्यापार, ऊर्जा और डिजिटल संपर्क को बेहतर बनाना है।
यह परियोजना पूरी होने पर दुनिया के सबसे बड़े और सबसे महत्वाकांक्षी मल्टीमॉडल आर्थिक गलियारों में शामिल हो सकती है। इसमें समुद्री मार्ग, रेलवे, सड़क परिवहन, ऊर्जा नेटवर्क और डिजिटल कनेक्टिविटी का संयुक्त रूप से इस्तेमाल किया जाएगा।
IMEC की घोषणा सितंबर 2023 में नई दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी BRI के संभावित विकल्प और वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भूमिका मजबूत करने वाली परियोजना के रूप में भी देखा जाता है।
दो प्रमुख हिस्सों में विकसित होगा IMEC
इस प्रस्तावित आर्थिक गलियारे के दो मुख्य भाग होंगे:
- पूर्वी गलियारा भारत को अरब की खाड़ी से जोड़ेगा।
- उत्तरी गलियारा खाड़ी क्षेत्र को जॉर्डन और इजरायल के रास्ते भूमध्य सागर तथा यूरोप से जोड़ेगा।
इसके बुनियादी ढांचे में रेलवे नेटवर्क, गहरे पानी वाले समुद्री बंदरगाह, बिजली ग्रिड, स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी सुविधाएं और हाई-स्पीड डेटा केबल शामिल किए जाने की योजना है।
कम हो सकता है समय और परिवहन खर्च
IMEC के जरिए पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में माल परिवहन का समय और खर्च कम होने की उम्मीद है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार, इस रास्ते से यात्रा का समय लगभग 40 प्रतिशत तक घट सकता है। हालांकि, वास्तविक बचत परियोजना के अंतिम स्वरूप, लागत, सीमा शुल्क व्यवस्था और संचालन क्षमता पर निर्भर करेगी।
मध्य पूर्व में जारी तनाव और राजनीतिक अस्थिरता के कारण परियोजना की प्रगति प्रभावित हुई है। विशेष रूप से इजरायल और आसपास के क्षेत्रों की परिस्थितियों ने इसके कुछ हिस्सों के क्रियान्वयन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
मजबूत और सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने की कोशिश
IMEC को भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच एक मजबूत तथा भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार करने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। यह मौजूदा समुद्री व्यापार मार्गों पर निर्भरता कम करने वाला एक वैकल्पिक नेटवर्क बन सकता है।
इस परियोजना के तहत बेहतर बंदरगाह, रेल संपर्क, ऊर्जा ग्रिड और समुद्र के भीतर बिछाई जाने वाली डेटा केबल विकसित करने की योजना है। इससे सामान के साथ-साथ ऊर्जा और डिजिटल डेटा का भी तेजी से आदान-प्रदान किया जा सकेगा।
कौन-कौन से देश और संगठन जुड़े हैं?
सितंबर 2023 में IMEC से संबंधित समझौता ज्ञापन पर भारत, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ ने हस्ताक्षर किए थे।
प्रस्तावित मार्ग में जॉर्डन और इजरायल की अहम भौगोलिक भूमिका मानी जाती है। वहीं तुर्की, कतर, ओमान, इराक और ईरान इस मूल समझौते के हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं।
भारत को क्या फायदा होगा?
भारत के पास मजबूत औद्योगिक आधार, बड़ा निर्यात बाजार और तेजी से विकसित होता बंदरगाह नेटवर्क है। इसी कारण IMEC से भारत को महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
इस गलियारे के बनने से भारतीय उत्पाद कम समय में मध्य पूर्व और यूरोपीय बाजारों तक पहुंच सकेंगे। इससे परिवहन लागत घट सकती है, निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है और भारत वैश्विक सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
IMEC भारत के लिए केवल एक व्यापारिक मार्ग नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का अवसर भी है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा जब सदस्य देश वित्तपोषण, तकनीकी मानकों, सीमा शुल्क और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों पर सहमति बनाकर परियोजना को जमीन पर उतार पाएंगे।
